लेकिन बाजार ने आत्मा की कीमत नहीं चुकाई। उसने मशीन से बना सस्ता कपड़ा खरीदना शुरू कर दिया। एक-एक करके सारी दुकानें बंद हुईं। करघे बेचे गए। बाबूराम ने हाथ बढ़ाकर कहा, "मुझे काम दो। मैं बुन सकता हूँ।"
कंपनी वालों ने कहा, "हमें तो ऑपरेटर चाहिए। जो बटन दबा सके, स्क्रीन पढ़ सके। तुम्हारा हुनर हमारे काम का नहीं।" structural unemployment in hindi
एक दिन शहर से एक बड़ी कंपनी के लोग आए। उनके पास था "ऑटो-लूम" - एक ऐसी मशीन जो दिन-रात चलती, कभी थकती नहीं, और एक मिनट में उतना कपड़ा बुन देती जितना बाबूराम पूरे दिन में बुनता। कभी थकती नहीं
यह कहानी है एक छोटे से कस्बे "कोल्हापुरी गेट" की, जो कभी हथकरघा बुनकरों के लिए मशहूर था। यहाँ के लगभग हर घर में करघा था। बाबूराम अपने पिता और दादा की तरह बुनकर था। उसके हाथ रंगों और रेशम के धागों से जादू कर देते थे। "हुनर मरता नहीं
कहानी का सीख:
कुछ महीनों बाद, सरकार ने एक स्किल डेवलपमेंट सेंटर खोला। वहाँ कंप्यूटर थे, मॉडर्न मशीनें थीं। पहले बाबूराम ने कहा, "मैं बूढ़ा हो गया हूँ सीखने के लिए।"
बाबूराम अक्सर कहता, "हुनर मरता नहीं, बस थोड़ा सा नया रूप ले लेता है। बस उसे पहचानना आता होना चाहिए।"